🔴 पुण्यतिथि पर नमन ----------🌹
#राजनीति_के_अनूठे_शिल्पकार ; #हरकिशन_सिंह_सुरजीत
● हरकिशन सिंह सुरजीत भारतीय राजनीति की एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होने कोई दो दशक तक अपनी राजनीतिक पार्टी की शक्ति और प्रभाव की तुलना से कहीं अधिक देश की राजनीति को ढाला, प्रभावित किया । ऐसा करते हुए उन्होंने दुनिया के हालात पर से भी नजर नहीं हटाई, बल्कि विश्व स्तर पर भी ऐसी भूमिका निबाही जिसकी भारतीय राजनीति में कोई दूसरी मिसाल नहीं है। वे भारतीय राजनीति की एक विशेष नस्ल, अदभुत पीढ़ी के नुमाईंदे थे। यह वह पीढ़ी है जो भगत सिंह से प्रभावित होकर मार्क्स से आकर्षित हुयी और कम्युनिस्ट बनी। सुरजीत ने यह राह किशोर आयु में ही चुन ली थी। वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता को दिए एक इंटरव्यू में कामरेड सुरजीत ने अपनी शुरुआती राजनीतिक कार्यवाही का जिक्र कुछ इस तरह से किया है ;
●🔴 " कांग्रेस और अकाली नेताओं ने कलेक्ट्री पर तिरंगा झंडा फहराने का आव्हान किया मगर जैसे ही उन्हें मिलिट्री आने और "देखते ही गोली मारने के आदेश " जारी होने की खबर लगी वैसे ही उन्होंने यह आव्हान वापस ले लिया। तब मैं कांग्रेस ऑफिस गया और कहा कि झंडा दो, मैं फहराऊंगा । कांग्रेसियों ने झण्डा नहीं दिया तो मैंने ही झण्डा उठा लिया ।
● 🔴 मिलिट्री को खबर मिल गयी थी कि कांग्रेस झण्डा नहीं फहराएगी । जब मैं झण्डा फहराने के लिए चढ़ा तो दो गोलियां चलीं । मुझे नहीं लगीं । कलेक्टर आमतौर से अंग्रेज हुआ करते थे । मगर यहां महाराष्ट्रियन था । उसने देखा कि एक छोटा सा 15 साल का लड़का झंडा फहराने चढ़ रहा है । उसने गोली चलाने से रोकने का हुक्म दिया ।
● 🔴 तिरंगा झण्डा फहराने के बाद जब मुझे पकड़ा गया तो मजिस्ट्रेट ने सजा सुनाई 1 साल ।
मैंने कहा बस एक साल ?
उसने कहा 4 साल !!
मैंने कहा बस चार साल ?
उसने कहा : अब इससे ज्यादा इस क़ानून में हो नहीं सकती !!"
इसी अदालत में सुरजीत से जब उनका नाम पूछा गया था तो उन्होंने बताया था ;
#लन्दन_तोड़_सिंह !!
● 🔴 इसी दौर में जब एक बार पं नेहरू की आमसभा के लिए जगह देने से प्रशासन ने इंकार कर दिया था तो सुरजीत और उनके पिता ने अपनी सारी खड़ी फसल उजाड़ कर खेत को ही सभा के मैदान में बदल दिया था।
देश की आज़ादी और एकता से अटूट प्रेम और साम्राज्यवाद तथा साम्प्रदायिकता-फूटपरस्ती से बेहिसाब घृणा और इन दोनों से समझौताहीन संघर्ष की जिस घुट्टी की खुराक उन्होंने15 वर्ष की आयु में पी थी - वह जीवन की आख़िरी सांस तक उनकी राजनीति की दिशासूचक सुइयां बनी रहीं। तीसरी दुनिया के देशों की राजनीति में बहुत ही विरल है इस प्रकार की निडर प्रतिबध्दता ; सुरजीत इसका प्रतीक थे।
● पंजाब के गरीब किसान परिवार में जन्मे इस छोटे से दिखने, लेकिन हमेशा तनकर चलने वाले व्यक्तित्व ने अपने जीवन में जो योगदान किये, जिनका वे हिस्सा बने - वे अनगिनत हैं। एक जीवन काल के लिए कुछ ज्यादा ही अधिक दिखते हैं।
● 🔴 अमरीका जब क्यूबा को भूखा मारने पर आमादा था - तब यह सुरजीत की हिम्मत और मेहनत थी जिसके चलते भारत के किसानों ने 10 हजार टन अनाज और न जाने कितने टन दूसरी सामग्री से भरे पानी के जहाज भर कर क्यूबा पहुंचा दिये, जिन्हे रोकने की हिम्मत क्यूबा की नाकेबन्दी किये बैठे अमरीका की भी नहीं हुयी।
● 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद जब यूरोप और दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों में विभ्रम फैला था तब यह सुरजीत की अगुआई वाली सीपीएम थी जिसने बाकायदा वैचारिक सन्दर्भों तथा तथ्यों के साथ इस घटनाविकास का तर्कसंगत विश्लेषण प्रस्तुत किया था। मार्क्सवाद प्रासंगिकता को सिद्द किया था। साफ़ किया था कि यह विचार की हार नहीं है उसके अनुचित तरीके से व्यवहार का दुष्परिणाम है। दुनिया की तमाम कम्युनिस्ट पार्टियों को इकट्ठा करके एक तरह से हौंसला और दिशा दोनों ही देने की कोशिश की थी।
● 🔴 1989 में वी पी सिंह सरकार में शामिल होने के लिए सूची हाथ में लिए बैठी भाजपा की सूची सुरजीत की एक टिप्पणी के बाद हाथ में ही रह गयी जब उन्होंने कहा कि सरकार जनता दल बनाये बाकी उसे बाहर से समर्थन करें। इसके बाद तो सुरजीत भाजपा और आरएसएस की नफरती सूची के शिखर पर आगये थे। सुरजीत की चिढ भाजपा भर से नहीं थी। सुरजीत ऐसे भारतीय राजनेता थे जिनके खिलाफ हर रंग की साम्प्रदायिक और राष्ट्रीय एकता विरोधी ताकते एकमत थी। पंजाब को झुलसा देने वाले खालिस्तानी आंदोलन और सिख -कट्टरपंथ के खिलाफ सुरजीत ने सिर्फ सियासी नहीं मैदानी मोर्चा भी लिया था। इसके चलते वे आतंकियों की हिट-लिस्ट में भी सबसे ऊपर रहे। उनके साथ यही सलूक कश्मीर के पृथकतावादी संगठनो से लेकर असम के इसी तरह के आंदोलन छेड़ने वाले ने किया । किन्तु सुरजीत सारे जोखिम उठाकर,राष्ट्रीय एकता की कायमी की दिशा में आगे बढ़ रहे ।
🔴 शाह बानो प्रकरण में उभरा कठमुल्लावाद हो या अयोध्या ध्वंस में प्रदर्शित हुआ हिंदुत्ववादी आतंक, वे मजबूती से राष्ट्रीय अखंडता और कौमी एकता की हिमायत में खड़े हुए। आज़ादी की लड़ाई के सैनानी होने और एक समर्पित कम्युनिस्ट होने के नाते उनकी चिढ हर उस विचार या फिरके या पार्टी से थी जो देश की एकता या अखंडता को नुक्सान पहुंचाता हो।
● जब ईरान के धार्मिक नेता आयतुल्लाह खोमैनी ने सलमान रश्दी के खिलाफ मौत की सुपारी दी थी -जिसे कुछ लोग फतवा कहते थे- तब कामरेड सुरजीत ने कहा था कि "कुछ व्यक्ति विक्षिप्त होते हैं लेकिन कुछ सरकारें भी विक्षिप्त होती हैं।" लगता है इन दिनों उनकी यह टिप्पणी लौट फिर कर भारत आ गयी है।
वे हमेशा जल्दी में रहते थे। एक भी पल जाया नहीं करते थे - उनकी सेन्स ऑफ़ टाइमिंग गजब की थी। उनका विट - हाजिर जवाबी - हंसी मजाक की तीक्ष्ण सारगर्भिता और भी अदभुत थी। घनघोर व्यस्तताओं के बावजूद वे लिखने पढ़ने का समय निकाल ही लेते थे। वे अच्छे लेखक होने के साथ ही साहित्यानुरागी और कला पारखी दोनों थे। "दुःखी दुनिया' 'चिंगारी" जैसे पत्र-पत्रिकाओं, लोकलहर पंजाबी और हिंदी दोनों के वे सम्पादक रहे। स्कूली शिक्षा तक पूरी न कर पाने वाले सुरजीत ने अनेकों किताबें लिखीं है जिनमे भारतीय कृषि संकट सहित अनेकों विषयों को समेटा गया है। भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के 26 खंडों के दस्तावेजों की उनकी भूमिकाएं एक तरह से देश दुनिया के इतिहास का गुटका संस्करण हैं।
●🔴 वे एक खांटी स्टेट्समैन थे - कभी भी किसी के भी साथ उन्होंने संवादहीनता नहीं पनपने दी, कभी भाषा और आलोचना का स्तर नीचा नहीं किया। 1989 में इन पंक्तियों के लेखक के लोकसभा चुनाव प्रचार में कामरेड सुरजीत ग्वालियर आये थे। उनकी सभा के ठीक पहले सामने के मंच से अटल बिहारी वाजपेयी सभा करके गए थे। सुरजीत ने अपने भाषण में उनका जिक्र करते हुए अपने पंजाबी लहजे में कहा कि "अभी उधर वाजपेयी भाषण देकर गए हैं ; आदमी अच्छा है, सोहबत खराब है। "
●🔴 अपने विचार और पार्टी के प्रति सुरजीत की प्रतिबध्दता पूर्ण थी। वे सिर्फ 1996 में ही अल्पमत में नहीं थे - कई और मौकों पर भी उनकी राय पार्टी में नहीं मनी - किन्तु वे अपनी राय के साथ नहीं पार्टी के फैसले के साथ खड़े हुए। राष्ट्रीय राजनीति के इस अनूठे शिल्पकार के योगदान को लेकर कुछ उन्ही के सहविचारी यह सवाल उठाते हैं कि "इस सबसे आंदोलन का क्या विस्तार हुआ?" लगता है उनका मानना यह है कि देश के राजनीतिक माहौल को जनवादी सामाजिक गतिविधियों के अनुकूल और हमवार बनाने के साथ साथ सुरजीत को ही गाँव गाँव- फ़ैक्ट्री फ़ैक्ट्री जाकर आंदोलन और संगठन बनाने का काम भी करना चाहिए था !!
🔴 हरकिशन सिंह सुरजीत; केमिस्ट्री की भाषा में कहें तो एक ऐसे उत्प्रेरक - कैटेलिस्ट - थे जिन्होंने अपनी उपस्थिति और हस्तक्षेप भर से ऐसे गुणात्मक राजनीतिक बदलाव ला दिए जिनके कल्पना तक नहीं की जा सकती। मिथकीय प्रतीकों में कहें तो वे भारतीय राजनीति के ऐसे भीष्म पितामह थे, जो कभी कौरवों के साथ नहीं खड़े हुए। एक ऐसे एकलव्य थे जिसने शोषकों के कहने पर अंगूठा कटाया नहीं बल्कि हमेशा उन्हें दिखाया। एक ऐसे चाणक्य हैं, जिसने किसी के राज्याभिषेक के लिए नहीं अवाम को ताकत बख़्शने के लिए अपना सर्वस्व झोंक दिया।
(Remembering Comrade Harkishan Singh Surjeet ----- #Badal_Saroj